Promoting good governance in public organisation essay in hindi


सार्वजनिक संस्थान हमेशा ही कुशासन के शक के घेरे में रहें हैं। आम लोगों का नजरिया इन संस्थानों के प्रति अति निम्न रहा है।   इसका मुख्य कारण है सार्वजनिक संस्थानों के कार्यकारी स्तर की कमी, निर्पेच्छ  शासन का आभाव , लोगों के प्रति तथा अपने काम के प्रति प्रभावहीनता  और कर्महीनता। इन संसथानो में लोग कर्म ही पूजा को भुलाकर कर्म की उपेक्षा में लग गए । आज कल तो कर्म की उपेक्षा करने के नए नए तकनीक भी प्रचलन में हैं । जब कभी भ्रष्टाचार का प्रश्न सामने आता है यह लोग अपनी ओर  न सोचकर दुसरे की ओर उंगली उठाते हैं। और यह बहुत सामान्य सी घटना हो गई है । यदि आप भारत की पूरे जनमानष से यह प्रश्न पूछेंगे तो सत प्रतित कोई भी भ्रष्ट और कामचोर नहीं मिलेगा ।सभी भ्रष्ट दुसरे लोग होते हैं । कठिन सवाल यह है कि यह दुसरे लोग हमी में से हैं।यही समीकरण सार्वजनिक संसथानो की लुटिया डुबाए हुए है।
अच्छा शासन अच्छे प्रबन्धन, अच्छा संपादन , अच्छे अनुबंधन और  अन्ततः अच्छे प्रतिफल को अग्रषित करता है। सार्वजनिक सस्थानो क उच्च पथ के शासकों की सबसे बड़ी कठिनाई है कि जो  निचले श्रेणी के पदाधिकारी और कार्यकारी लोग हैं वे संसथानो के उद्देश्य को कभी अपनी  जिम्मेदारी  से जुड़ने नहीं दिए। वे सभी कार्यों को सरकार नाम के झोले में डाल देते हैं । और एक वाक्य की उल्टी कर देते हैं की - क्या करें भाई सरकारी काम है। ऐसे ही होता है। ऐसा लगता है सरकार नाम ही लाचार कमजोर और भ्रष्ट हो गया है। सरकारी संस्थाएं ऐसी हो गयी हैं जहाँ नेतृत्व दिशा और नियंत्रण की कमी है। और यह धारणा बहुत आम हो चुका है।
इसका समाधान यह है की हमें सबसे पहले अपने आप को परखना पड़ेगा और अपने आप को सबसे पहले प्रोत्साहित करना पड़ेगा। प्रोत्साहन को चर्चा में रखना पड़ेगा।इस तरह के चारित्रिक उत्थान से देश के सार्वजनिक संस्थान अपनी गरिमा को बढ़ा सकेंगे। सर्वांगिक सुशासन के लिए अच्छे और सच्चे मंत्रियों का होना ही जरुरी नहीं है वरन हमें अपनी भावना और सोंच को जगाना है। अपने आप को बदलने से सबकुछ स्वयं बदल जायेगा ।
सार्वजनिक संस्थानों में अच्छे शासन की परिकल्पना तभी संभव है जब सरकारी संस्थानों के मूल सिद्यान्तों को साकार में लाया जाय ।
यह मूल सिधान्त निम्नलिखित है।
क -  अखन्डता, नैतिक मूल्यों और कानून के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता ।
ख - अपने कार्य के प्रति लगन और देशप्रेम की भावना होनी चाहिए ।
ग- आप का कर्म उस श्रेणी का होना चाहिए कि स्वयं आम आदमी आपके काम को महशूस करे।
घ-प्रशासनिक सुधार में कोम्पुटर।ised परिदार्शिता की आवश्यकता।
च- प्रशासन को नैतिकतापूर्ण धरातल पर लाने की आवश्यकता ।
छ- प्रशासनिक अधिकारियों की पदोन्नति के  श्रेणी निर्धारण का कुछ भाग आम जनता अर्थात ग्राहक के हाथ में देना। यह अत्यधिक निर्णायक साबित हो सकता है।
ज-प्रत्येक सेवा का ऑनलाइन फीडबैक का विकल्प लाना। ताकि जो उपभोग्ता कुछ कहना चाहता हो वह सीधे सीधे ऊपरी स्तर तक अपनी बात रख पाए और अधिकारी की तारीफ़ कर पाए। ऐसा करने से कर्म की प्रधानता स्वयं बढ़ जायेगी।
***इस  दिशा में कांग्रेस पार्टी ने एक अच्छे पद्धति की सुरुआत की है ।जिसकी मै जितना भी तारीफ़ करूँ कम है।
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